Narak Chaturdashi And Chhoti Diwali 2023

Narak Chaturdashi 2023 : नरक चतुर्दशी आज, महालक्ष्मी के स्वागत के लिए करें तैयारी, यमराज के लिए दीपदान करने का सही समय, मुहूर्त

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Narak Chaturdashi 2023, Chhoti Diwali : हिंदू धर्म में नरक चतुर्दशी के पर्व का खास महत्व है। इसे छोटी दिवाली, रूप चौदस, नरक चौदस, रूप चतुर्दशी और नरका पूजा के नामों से भी जाना जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज और भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का विधान है। रूप चौदस के दिन संध्या के समय दीपक जलाए जाते हैं और चारों ओर रोशनी की जाती है। नरक चतुर्दशी का पूजन अकाल मृत्यु से मुक्ति और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए किया जाता है।

हर साल नरक चतुर्दशी का पर्व कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व दिवाली के एक दिन पहले और धनतेरस के एक दिन बाद आता है, लेकिन इस बार नरक चतुर्दशी की सही तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इस पर्व से जुड़ी तीन मान्यताएं हैं। पहला यह दिन देवी महालक्ष्मी के स्वागत के लिए सजने-संवरने का दिन है। दूसरा श्रीकृष्ण ने कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी पर नरकासुर नाम के दैत्य का वध किया था। तीसरा यह पर्व यमराज के लिए दीपदान करने के लिए खास है। बता दें कि 12 नवंबर को लक्ष्मी पूजा की जाएगी।

इससे पहले रूप चौदस पर भक्त अपना रूप निखारने के लिए उबटन लगाते हैं, तेल मालिश करते हैं और पानी में जड़ी बूटियां मिलाकर स्नान करते हैं। माना जाता है कि देवी लक्ष्मी उन्हीं लोगों पर कृपा करती हैं, जो साफ-सफाई से रहते हैं, जिनके घर और विचारों में पवित्रता रहती है।

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आज मनाया जाएगा नरक चतुर्थी व छोटी दिवाली का पर्व

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरुआत 11 नवंबर को दोपहर 1:57 बजे से हो रही है। इस तिथि का समापन अगले दिन 12 नवंबर को दोपहर 2:44 बजे होगा। छोटी दिवाली यानी नरक चतुर्दशी के लिए प्रदोष काल 11 नवंबर को प्राप्त हो रहा है, इसलिए छोटी दिवाली 11 नवंबर को मनाई जाएगी। ऐसे में जो लोग मां काली, हनुमान जी और यम देवता की पूजा करते हैं, वह 11 नवंबर को नरक चतुर्थी यानी छोटी दिवाली का पर्व मनाएंगे। वहीं नरक चतुर्दशी या रूप चौदस के दिन रूप निखारा जाता है। जिसके लिए प्रात: काल यानि सूर्योदय से पूर्व स्नान की परंपरा है। उदया तिथि को देखते हुए कुछ लोग नरक चतुर्दशी 12 नवंबर को मनाएंगे। इसी दिन बड़ी दिवाली भी है।

इस दौरान घरों में अभ्यंग स्नान होगा। सभी लोग सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान और पूजन करेंगे। स्त्रियों के लिए यह पर्व खास होगा। दरअसल स्त्रियां सज संवरकर पूजन-अर्चना करेंगी। इस दौरान सड़कों, घरों, भवनों में दीपावली की जगमग रहेगी। शाम होते ही वातावरण झिलमिलाने लगेगा।

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ऐसी है मान्यता

रूप चतुर्दशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करने से लोगों को नर्क की यातनाऐं नहीं भोगनी पड़ती है। साथ ही इस दिन लोग उबटन से स्नान करते हैं। स्नान के बाद दीपदान होता है। प्रतीकात्मक तौर से हल्दी मिले आटे के दिये को पांव लगाया जाता है। श्रद्धालु महिलाएं घर आंगन को रंगोली के रंगों से संवारती हैं। इस दिन दीपों की जगमगाहट से लोगों के घर वृंदनवार रोशन होते हैं। रूप चतुदर्शी के अलगे दिन कार्तिक अमावस्या पर लक्ष्मी पूजन किया जाता है। ऐसे में यह दीपावली की शुरूआत होती है। रूप चतुर्दशी पर स्नान के दौरान लोग पटाखे चलाकर उत्साह मनाते हैं।

यह रहेगा यम दीपक जलाने का समय

नरक चतुर्दशी पर प्रदोष काल में यम दीपक जलाया जाता है, इसलिए 11 नवंबर को यम दीपक जलाया जाएगा। इस दिन शाम 5:32 मिनट से सूर्यास्त होगा। उसके साथ ही प्रदोष काल शुरू हो जाएगा। ऐसे में शाम 5:32 बजे से यम का दीपक जलाया जा सकता है।

अभ्यंग स्नान का समय 

अभ्यंग स्नान के लिए उदया तिथि महत्वपूर्ण मानी जाती है। नरक चतुर्दशी की उदया तिथि 12 नवंबर को प्राप्त हो रही है। इस दिन अभ्यंग स्नान का समय सुबह 5:28 से 6:41 बजे तक है। बता दें कि नरक चतुर्दशी पर सूर्योदय के पूर्व शरीर पर उबटन लगाकर स्नान करने की प्रक्रिया को अभ्यंग स्नान कहा जाता है।

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काली चौदस 2023 पूजा मुहूर्त

नरक चतुर्दशी पर मां काली की पूजा रात में की जाती है। काली चौदस की पूजा का समय 11 नवंबर को है। इस दिन पूजा का मुहूर्त रात 11:45 बजे देर रात 12:39 बजे तक है।

हनुमान पूजा 2023 मुहूर्त

नरक चतुर्दशी के दिन हनुमान जी की भी पूजा करने की परंपरा है। इस साल नरक चतुर्दशी पर हनुमान पूजा 11 नवंबर को रात में होगी। हनुमान पूजा का शुभ मुहूर्त रात 11:45 से देर रात 12:39 बजे तक है।

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बजरंगबली की पूजा का भी है विशेष महत्व

ज्योतिषाचार्य के अनुसार माना जाता है कि पवन पुत्र हनुमान का जन्म इसी दिन हुआ था, इसीलिए आज बजरंगबली की भी विशेष पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन भगवान हनुमान ने माता अंजना के गर्भ से जन्म लिया था। इस दिन भक्त दुख और भय से मुक्ति पाने के लिए हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन हनुमान चालीसा और हनुमान अष्टक का पाठ करना चाहिए।

शास्त्रों में कहा गया है कि धन की देवी मां लक्ष्मी जी उसी घर में रहती हैं, जहां सुंदरता और पवित्रता होती है। लोग लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए घरों की सफाई और सजावट करते है। इसका अर्थ यह भी है कि वो नरक यानि गंदगी का अंत करते हैं। इस दिन रात को तेल अथवा तिल के तेल के 14 दीपक जलाने की परम्परा है। देवी महालक्ष्मी धन की प्रतीक हैं। धन का अर्थ केवल पैसा नहीं होता। तन-मन की स्वच्छता और स्वस्थता भी धन का ही कारक है। धन और धान्य की देवी लक्ष्मी जी को स्वच्छता अतिप्रिय है। धन के नौ प्रकार बताए गए हैं, प्रकृति, पर्यावरण, गोधन, धातु, तन, मन, आरोग्यता, सुख, शांति समृद्धि भी धन कहे गए हैं। लंबी उम्र के लिए नरक चतुर्दशी के दिन घर के बाहर यम का दीपक जलाने की परंपरा है।

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ऐसा माना जाता है कि चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु ने माता अदिति के आभूषण चुराकर ले जाने वाले निशाचर नरकासुर का वध कर 16 हजार कन्याओं को मुक्ति दिलाई थी। परंपरा में इसे शारीरिक सज्जा और अलंकार का दिन भी माना गया है। इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है, इसलिए इस दिन महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में हल्दी, चंदन, सरसों का तेल मिलाकर उबटन तैयार कर शरीर पर लेप कर उससे स्नान कर अपना रूप निखारती हैं।

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क्यों कहते हैं नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी?

ऐसी मान्यता है कि हिरण्यगभ नाम के एक राजा ने राज-पाट छोड़कर तप में विलीन होने का फैसला किया। कई वर्षों तक तपस्या करने की वजह से उनके शरीर में कीड़े पड़ गए। इस बात से दुखी हिरण्यगभ ने नारद मुनि से अपनी व्यथा कही। नारद मुनि ने राजा से कहा कि कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के दिन शरीर पर लेप लगाकर सूर्योदय से पूर्व स्नान करने के बाद रूप के देवता श्री कृष्ण की पूजा करें। ऐसा करने से फिर से सौन्दर्य की प्राप्ति होगी। राजा ने सब कुछ वैसा ही किया जैसा कि नारद मुनि ने बताया था। राजा फिर से रूपवान हो गए, तभी से इस दिन को रूप चतुर्दशी भी कहते हैं।

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रूप चतुर्दशी का महत्व

माना जाता है कि रूप चौदस पर व्रत रखने का भी अपना महत्व है। मान्यता है कि रूप चौदस पर व्रत रखने से भगवान श्रीकृष्ण व्यक्ति को सौंदर्य प्रदान करते हैं। रूप चतुदर्शी के दिन सूर्योदय से पहले उठकर तिल के तेल की मालिश और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर नहाना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण के दर्शन करने चाहिए। ऐसा करने से पापों का नाश होता है और सौंदर्य हासिल होता है। साथ ही रूप चौदस की रात मान्यतानुसार घर का सबसे बुजुर्ग पूरे घर में एक दिया जलाकर घुमाता है और फिर उसे घर से बाहर कहीं दूर जाकर रख देता है। इस दिए को यम दीया कहा जाता है। इस दौरान घर के बाकी सदस्य अपने घर में ही रहते हैं। माना जाता है कि इस दिए को पूरे घर में घुमाकर बाहर ले जाने से सभी बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं।

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नरक चतुर्दशी पर्व के पीछे कई पौराणिक कथाएं

बताया जाता है कि नरक चतुर्दशी पर्व मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। इन्हीं में से एक कथा नरकासुर वध की भी है। कथा के मुताबिक प्रागज्योतिषपुर नगर का राजा नरकासुर नामक दैत्य था। उसने अपनी शक्ति से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु आदि सभी देवताओं को परेशान कर दिया। वह संतों को भी त्रास देने लगा। महिलाओं पर अत्याचार करने लगा। जब उसका अत्याचार बहुत बढ़ गया तो देवता व ऋषिमुनि भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए।

भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें नरकासुर से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया, लेकिन नरकासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया तथा उन्हीं की सहायता से नरकासुर का वध किया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरकासुर का वध कर देवताओं व संतों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। उसी की खुशी में दूसरे दिन अर्थात कार्तिक मास की अमावस्या को लोगों ने अपने घरों में दीएं जलाए, तभी से नरक चतुर्दशी तथा दीपावली का त्योहार मनाया जाने लगा।

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अवश्य करें यह कार्य

ज्योतिषाचार्य के अनुसार इस दिन जहां घर की सफाई की जाती है, वहीं घर से हर प्रकार का टूटा-फूटा सामान भी बाहर फेंक देना चाहिए। घर में रखे खाली पेंट के डिब्बे, रद्दी, टूटे-फूटे कांच या धातु के बर्तन, किसी प्रकार का टूटा हुआ सजावटी सामान, बेकार पड़ा फर्नीचर व अन्य प्रयोग में न आने वाली वस्तुओं को यमराज का नरक माना जाता है, इसलिए ऐसी बेकार वस्तुओं को घर से हटा देना चाहिए।

यह भी है पौराणिक कथा

जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर दैत्यराज बलि से तीन पग धरती मांगकर तीनों लोकों को नाप लिया तो राजा बलि ने उनसे प्रार्थना की कि हे प्रभु मैं आपसे एक वरदान मांगना चाहता हूं। यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो वर देकर मुझे कृतार्थ कीजिए। तब भगवान वामन ने पूछा कि क्या वरदान मांगना चाहते हो, राजन? दैत्यराज बलि बोलें कि प्रभु आपने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से लेकर अमावस्या की अवधि में मेरी संपूर्ण पृथ्वी नाप ली है, इसलिए जो व्यक्ति मेरे राज्य में चतुर्दशी के दिन यमराज के लिए दीपदान करें। उसे यम यातना नहीं होनी चाहिए। जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का पर्व मनाए, उनके घर को लक्ष्मीजी कभी न छोड़ें।

राजा बलि की प्रार्थना सुनकर भगवान वामन बोलें कि राजन मेरा वरदान है कि जो चतुर्दशी के दिन नरक के स्वामी यमराज को दीप दान करेंगे, उनके पितर कभी नरक में नहीं रहेंगे। जो व्यक्ति इन तीन दिनों में दीपावली का उत्सव मनाएंगे, उन्हें छोड़कर मेरी प्रिय लक्ष्मी अन्यत्र नहीं जाएंगी। भगवान वामन द्वारा राजा बलि को दिए इस वरदान के बाद से ही नरक चतुर्दशी के दिन यमराज के निमित्त व्रत, पूजन और दीपदान का प्रचलन आरंभ हुआ, जो आज तक चला आ रहा है।