हरियाणा में बीजेपी राज में बड़ी घोटाला सामने आया है। जिसमें किसानों को किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ का अनुदान बांटने में करोड़ों रुपये की अनियमितता सामने आई है। हालांकि घोटाले की जानकारी मिलने के बाद सीएम मनोहर लाल ने बागवानी विभाग के 10 अधिकारियों पर कार्रवाई की। लेकिन केंद्र सरकार मनोहर सरकार की कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है। जिसके चलते अब केंद्र सरकार ने इस पूरे मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है।
केंद्र सरकार ने मनोहर सरकार को पत्र लिखकर उनकी सहमति मांगी थी। जिसके बाद मनोहर लाल ने भी सीबीआई जांच के लिए अफनी सहमति देने की तैयारी कर ली है। उधर, केंद्र सरकार को हरकत में आते देख हरियाणा सरकार के बागवानी विभाग के अधिकरियों के साथ-साथ कुछ फर्म मालिकों की भी नींद उड़ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक इस घोटाले में विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
केंद्र तक पहुंची इसकी शिकायत
किसान उत्पादक संगठन द्वारा अनुदान वितरण में अनियमितता की शिकायत केंद्र सरकार तक पहुंची थी। इसमें कहा गया था कि हरियाणा सरकार के बागवानी विभाग के अधिकारियों ने एफपीओ के नाम पर स्वीकृत अनुदान किसानों के बैंक खातों में जमा नहीं कराया। शिकायत में कहा गया कि इस अनियमितता से जुड़ी जानकारी हरियाणा सरकार तक भी पहुंची है और इसके बाद मुख्यमंत्री के स्तर पर हुई सीबीआई जांच में भ्रष्टाचार के खुलासा हुआ है।
इस तरह से चलती है प्रक्रिया
दरअसल बागवानी विभाग द्वारा किसानों को पानी बचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन तकनीक से सिंचाई करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। सरकार किसानों को ड्रिप इरिगेशन पर 85 प्रतिशत तक अनुदान दे रही है। योजना से जुड़ने वाले किसान को विभाग की वैबसाइट पर ऑनलाइन फार्म अप्लाई करना होता है और पटवारी से मिली जमीन की रिपोर्ट को भी खुद ही अपलोड करना होता है।
अपलोड करने के बाद बागवानी विभाग द्वारा ड्रिप कंपनी का इंजीनियर, बागवानी विभाग के दो अधिकारी व आवेदनकर्ता किसान की एक कमेटी गठित की जाती है, जो कि किसान द्वारा किए गए आवेदन के अनुसार वस्तुस्थिति का भौतिक निरीक्षण करती है। इस कमेटी में रैवेन्यू विभाग को शामिल नहीं किया जाता है। भौतिक निरीक्षण के बाद बागवानी विभाग द्वारा इसकी सूचना चंडीगढ़ मुख्यालय को भेजी जाती है, जिसके आधार पर किसान के खाते में अनुदान राशि भेजी जाती है। पटवारी की असल रिपोर्ट जमा न होने से होती रही गड़बड़ी शिकायत में बताया गया कि गत वर्ष मंढोली कलां गांव में उजागर हुई। गड़बड़ी के बाद अगर अन्य ड्रिप इरिगेशन अनुदान राशि की जांच की जाए तो और भी गड़बड़ी सामने आ सकती है।
मामले में यह बात सामने आई है कि पटवारी किसान को जमीन की पैमाइश की जो रिपोर्ट देता है। वह केवल विभाग की वैबसाइट पर अपलोड ही की जाती है। उसकी कॉपी न तो हॉर्टिकल्चर विभाग के पास जमा होती है और न ही इसका पटवारी के पास कॉपी देने के बाद कोई रिकॉर्ड रखा जाता है। इसके अलावा आवेदन मिलने के बाद भौतिक निरीक्षण के लिए जो कमेटी बनती है उसमें भी पटवारी को शामिल नहीं किया जाता है। जिसकी वजह से किसान द्वारा अपलोड की गई पटवारी की रिपोर्ट व भौतिक निरीक्षण कमेटी की रिपोर्ट को आधार मान कर ही राशि जारी कर दी जाती है।