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समाज के लिए मिसाल हैं डोभी गाँव की बेटियां, रूढ़िवादी सोच को दे डाली बड़ी चुनौती, मां की अर्थी को दिया कंधा

हरियाणा हरियाणा की शान हिसार

हरियाणा के डोभी गांव में आज एक ऐसा ऐतिहासिक और प्रेरणादायक पल देखने को मिला, जिसने समाज की गहरी जड़ें जमाई रूढ़िवादी परंपराओं को हिला कर रख दिया। गाँव की चार बेटियों ने अपनी मां की अर्थी को कंधा देकर और सभी अंतिम संस्कार की रस्में निभाकर साबित कर दिया कि बेटियां किसी भी दृष्टि से बेटों से कम नहीं हैं।

घटना का विवरण

गांव डोभी की हरकोरी देवी, पत्नी स्वर्गीय नेकीराम सुथार, का 73 वर्ष की आयु में निधन हो गया। हरकोरी देवी के केवल 8 बेटियां थीं और कोई बेटा नहीं था। समाज की परंपराओं के अनुसार, अंतिम संस्कार के सारे अधिकार बेटे के हाथों में होते हैं, लेकिन जब परिवार में बेटा ही न हो, तो क्या होगा? इस सवाल का जवाब इन बहादुर बेटियों ने अपने साहस और कर्तव्य के प्रति अटूट विश्वास से दिया।

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इन चारों बेटियों ने न केवल अपनी मां की अर्थी को कंधा देकर अंतिम यात्रा का नेतृत्व किया, बल्कि सभी धार्मिक और पारंपरिक रस्मों को भी पूरी गरिमा और आदर के साथ निभाया। इस दौरान गांव के लोगों ने भी इस ऐतिहासिक क्षण को देखा और इन बेटियों के इस कदम को सराहा।

समाज को दिया बड़ा संदेश

इस घटना ने रूढ़िवादी सोच को चुनौती देते हुए समाज को यह सिखाया कि कर्तव्य निभाने के लिए जेंडर का कोई बंधन नहीं है। बेटियां हर उस जिम्मेदारी को निभा सकती हैं, जिसे अब तक केवल बेटों का अधिकार समझा जाता था। ये बेटियां समाज में बदलाव की मिसाल बन गई हैं और उनके इस कदम की हर ओर प्रशंसा हो रही है।

गांव और समाज की प्रतिक्रिया

ग्राम पंचायत डोभी ने इन बेटियों को सलाम किया और उनके इस कदम को महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बताया। आसपास के गाँवों और क्षेत्र में भी इन बेटियों के साहस और समझदारी की चर्चा हो रही है। यह घटना न केवल एक परिवार की कहानी है, बल्कि पूरे समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश है।

अपराजिता नारी का परिचय

इन चार बेटियों ने यह साबित कर दिया कि नारी को कमजोर समझने वाली मानसिकता अब बदलने का समय है। इनका यह कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बनेगा और महिलाओं के अधिकारों और उनके कर्तव्यों को लेकर समाज में नई सोच लाने का काम करेगा।

डोभी की इन बेटियों को सलाम, जिन्होंने साहस, कर्तव्य और प्यार का अद्भुत उदाहरण पेश किया। समाज को उनके इस योगदान पर गर्व है। यह घटना इतिहास के पन्नों में “अपराजिता नारी” के रूप में दर्ज होनी चाहिए।

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