पुरानी पेंशन योजना (OPS) यानि बुढ़ापे की सामाजिक सुरक्षा, यह सुरक्षा प्रदेश सरकार की ओर से सरकारी कर्मचारियों को मुहैया करवाई जाती थी, लेकिन सरकार की तरफ से लाई गई नई पेंशन योजना के तहत कर्मचारियों को ओपीएस का लाभ मिलना बंद हो गया है। ऐसे में कर्मचारी वर्ग भी अपना हक हासिल करने के लिए पीछे नहीं हटा है। प्रदेश में कई माह से कर्मचारी वर्ग ओपीएस को लेकर संघर्षरत है। साथ ही मौजूदा सरकार पर दबाव बना रहा है कि उन्हें नई पेंशन योजना की बजाय ओपीएस का लाभ दिया जाए। जिससे उनका भविष्य सुरक्षित रह सके। उधर पुरानी पेंशन योजना को लेकर भाजपा सरकार की टेंशन बढ़ गई है, जबकि कांग्रेस पार्टी एक्शन में दिखाई दे रही है।
बता दें कि अपने चुनावी वायदों के अनुसार पांच राज्यों की सरकारों ने पुरानी पेंशन योजना को लागू कर दिया है, जबकि हरियाणा का कर्मचारी वर्ग काफी समय से ओपीएस को लागू करने की मांग कर रहा है। वहीं माना जा रहा है कि ओपीएस वर्ष 2024 के चुनावों में गेम चेंजर का काम कर सकता है। कांग्रेस ने भी पुरानी पेंशन योजना को लेकर अपना दाव चल दिया है। इससे पहले हिमाचल और कर्नाटक प्रदेश में इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस पार्टी सत्ता में दोबारा काबिज हो चुकी है। अब इसी मुद्दे को लेकर हरियाणा में अपना लक्ष्य साधने पर जुटी है। हरियाणा के करीब 3 लाख कर्मचारी सरकार से ओपीएस की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है।

ओपीएस को लेकर हिमाचल के बाद अब हरियाणा में भी कांग्रेसी दाव
कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी ने अक्तूबर 2022 में हिमाचल प्रदेश के कर्मचारियों को चुनावी प्रचार के दौरान वायदा किया था कि सरकार बनने के बाद पहली कैबिनेट बैठक में ओपीएस के मुद्दे पर मोहर लगाई जाएगी। इसके बाद कांग्रेस अपने इस वादे पर खरी उतरी। गत दिनों दिल्ली के रामलीला मैदान में देशभर के लाखों कर्मचारियों ने ओपीएस के मुद्दे पर रैली की। जिसमें नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम से जुड़े संगठन शामिल हुए। इस दौरान प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी कर्मचारियों के बीच अपना राजनीतिक दाव चल दिया। रैली में पहुंचे भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने प्रियंका गांधी की तर्ज पर घोषणा करते हुए कहा कि हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनते ही पहली कलम से पुरानी पेंशन योजना को लागू किया जाएगा।
हरियाणा में राजनीति का पख्ता पलट सकती है ओपीएस
भीड़ के लिहाज से किसी राजनीतिक दल की रैली में इतने लोग उमड़ते जो राजनीति के पंडित उस दल के पक्ष में शब्दों का तूफान खड़ा कर देते। रैली में साफ शब्दों में सुनने को मिला कि जो ओपीएस को बहाल करेगा वो देश पर राज करेगा। इस लिहाज से यह सत्ताधारी दल को चेतावनी भी थी कि ओपीएस को बहाल नहीं किया गया तो उन्हें कर्मचारी वर्ग के वोट से वंचित रहना पड़ेगा। कर्मचारियों की इस रैली में हरियाणा का कर्मचारी भी पीछे नहीं था, जो आने वाले समय में ओपीएस की मांग पर प्रदेश की राजनीति का पख्ता पलटने का काम कर सकता है।

वोट फॉर ओपीएस की यह मुहिम हमारी है, घर पेंशन नहीं है तो न वोट तुम्हारी है
वोट फॉर ओपीएस की यह मुहिम हमारी है, घर पेंशन नहीं है तो न वोट तुम्हारी है, इसी तर्ज पर देशभर से जुटे रैली में सरकारी कर्मचारियों ने एक होकर नारे लगाए। इस बार कर्मचारियों ने सरकार से ओपीएस लागू करने के लिए गुहार नहीं लगाई, बल्कि सीधे तौर पर चेतावनी दी है कि अगर उन्हें ओपीएस का लाभ नहीं मिला तो वह अपना वोट किसी अन्य पार्टी के पक्ष में डालने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
कर्मचारी वर्ग की रैली में गूंजा बिजेंद्र धारीवाल का नाम
हरियाणा का वह नाम जो दिल्ली के रामलीला मैदान में देशभर के जुटे कर्मचारी वर्ग के बीच गूंजा। कौन है बिजेंद्र धारीवाल, आपको बता दें कि बिजेंद्र इस रैली के मंच संचालक थे, जो हरियाणा के जिला कैथल से संबंध रखते हैं। इतना ही नहीं यह शख्स नेशनल मूवमेंट फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम के राष्ट्रीय मुख्य संयोजक के साथ हरियाणा पेंशन बहाली संघर्ष समिति के अध्यक्ष भी हैं। इस रैली में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के अलावा अन्य कोई राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं पहुंचा। ऐसे में कयास है कि पुरानी पेंशन योजना चुनावी रूपी उंट को किस करवट बैठा सकती है, यह ज्यादा बयां करने की जरूरत नहीं है। हालांकि इससे पहले भी प्रदेश का कर्मचारी वर्ग पेंशन बहाली संघर्ष समिति के नेतृत्व में चंडीगढ़ में प्रदर्शन कर चुका है। वहीं लोकसभा चुनाव से पहले जींद में भी 19 फरवरी 2024 को एक बड़ी रैली का आयोजन करने की तैयारी कर ली है। जिसके लिए पोस्टर भी जारी कर दिया गया है।

प्रदेश की राजनीति पर मंडराते जींद की धरती और 8 लाख वोटरों की संख्या रूपी बादल
बता दें कि हरियाणा में करीब 3 लाख सरकारी कर्मचारी हैं, जो 1.75 लाख कर्मचारी एनपीएस के दायरे में आते हैं। अगर इन कर्मचारियों को परिवार सहित जोड़कर देंखे तो इनकी वोटर संख्या करीब 8 लाख पर पहुंचती है। पेंशन बहाली संघर्ष समिति लोकसभा चुनाव से पहले फरवरी 2024 में जींद की धरती पर ओपीएस का शंखनाद फूंकने की तैयारी में हैं। माना जाता है कि जींद की धरती को राजनीतिक रूप से वरदान है और चुनावों में कई बार यहां से राजनीतिक समीकरण बदले जा चुके हैं।
ओपीएस पर वर्ष 2018 से संघर्षरत है पेंशन बहाली संघर्ष समिति
समिति के अध्यक्ष धारीवाल का कहना है कि कर्मचारी वर्ग वर्ष 2018 से ओपीएस बहाली को लेकर संघर्षरत है। दिल्ली की शंखनाद रैली में कोई राजनीतिक विषय नहीं था, बल्कि दो बार पहले भी रैलियों के माध्यम से सरकार को ओपीएस के प्रति आगाह किया गया है। रैली के लिए किसी पार्टी विशेष को नहीं, बल्कि सभी पार्टियों को खुला निमंत्रण था। जिसमें प्रधानमंत्री, गृह मंत्री स्वयं भी वहां पहुंच सकते थे। राजनीति में सत्ता और विपक्ष दोनों की अपनी महत्ता है। अगर सरकार किसी मुद्दे पर विचार नहीं करती है तो उस मुद्दे को उठाना विपक्ष का दायित्व बनता है। रैली में कांग्रेस के अलावा कई अन्य पार्टियों के नेता भी मौजूद थे। रैली में कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं की। कर्मचारी वर्ग का उद्देश्य केवल ओपीएस पर आवाज उठाना था।

आचार संहिता से पहले ओपीएस लागू हुआ तो होगी धन्यवाद रैली
पेंशन बहाली संघर्ष समिति के अध्यक्ष बिजेंद्र धारीवाल ने कहा कि अगर सरकार लोकसभा चुनाव से पहले ओपीएस को लागू करने का वादा पूरा कर देती है तो कमर्चारी वर्ग जींद में फरवरी 2024 में होने वाली रैली को धन्यवाद रैली में तबदील कर देगा। अन्यथा कर्मचारियों ने रैली को ओपीएस का संकल्प नाम दिया है। सभी की मांग भी है कि जो ओपीएस को लागू करेगा, वहीं देश पर राज करेगा। इस बार कर्मचारी अपने परिवार, बच्चों और भविष्य के मुद्दे पर वोट देने का काम करेंगे।
क्या है पुरानी पेंशन योजना
सरकार की ओर से 1 अप्रैल 2004 को पुरानी पेंशन योजना लागू की गई थी। जिसे कांग्रेस की मनमोहन सरकार ने जमीन पर उतारा। इसके बाद सरकारी खजाने पर बढ़ते बोझ की वजह बताकर योजना को बंद कर दिया गया। एक तरफ जहां सरकार सरकारी कर्मचारियों को ओपीएस का गणित समझा रही है, वहीं सांसदों और विधायकों के लिए इस योजना का लाभ जारी है। जिनके वेतन से कोई कटौती नहीं की जा रही है।

ओपीएस और एनपीएस में अंतर
आपको बता दें कि पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) और नई पेंशन योजना (एनपीएस) कितना अंतर है। ओपीएस में वेतन में कोई कटौती नहीं की जाती थी, जबकि एनपीएस में 10 फीसदी हिस्सा आपके वेतन से काटा जाता है और 14 फीसदी हिस्सा सरकार की ओर से दिया जाता है। ओपीएस में कर्मचारी के अंतिम वेतन का 50 फीसदी हिस्सा सेवानिवृत्ति के बाद प्रतिमाह मिलता है, जबकि एनपीएस में सेवानिवृत्ति पर कर्मचारी को कितनी रकम मिलेगी, यह तय नहीं है। सेवानिवृत्ति पर 25 से 40 फीसदी हिस्सा कर्मचारी निकाल सकता है। ओपीएस में कर्मचारी की मृत्यु के बाद आश्रितों को पेंशन मिलती थी। कर्मचारी को ग्रेज्युटी लाभ भी सेवानिवृत्ति पर मिलता था।
वहीं एनपीएस में अन्य एनबीटी के माध्यम से बाजार में निवेश होगा। जिसमें पूरा जोखिम बाजार के अधीन होता है। वहीं कांग्रेस इस मुद्दे पर इसलिए उत्साहित है, क्योंकि भाजपा सरकार इस मुद्दे को लागू करने में कोई रूचि नहीं दिखा रही। यही वजह रही है कि जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकार आई, वहां ओपीएस देने के लिए एनपीएस को समाप्त कर दिया गया। साथ ही उन राज्यों में यह नुकसान भी है कि वहां के कर्मचारियों का शेयर केंद्र के पास अटक कर रह गया है। जिससे इन राज्यों को ओपीएस लागू करने में वित्तीय समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
देश के इन राज्यों में सरकारी कर्मचारियों को मिल रहा ओपीएस का लाभ
राजस्थान : राजस्थान पुरानी पेंशन (ओपीएस) को लागू करने वाला पहला राज्य है। सीएम अशोक गहलोत ने वर्ष 2023-24 में राज्य का बजट पेश करने के दौरान नई पेंशन योजना को खत्म करके ओपीएस को बहाल करने का ऐलान किया था।
छत्तीसगढ़ : इसी साल जनवरी में छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने बजट की घोषणा के बाद कर्मचारियों को नई और पुरानी पेंशन योजना को चुनने का विकल्प दिया। कैबिनेट ने फैसला किया था कि कर्मचारी नई पेंशन के लिए राज्य द्वारा किए गए योगदान और उस पर अर्जित लाभांश को जमा करने के बाद ओपीएस में वापस जा सकते हैं।
झारखंड : 1 सितंबर 2022 को झारखंड कैबिनेट ने पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की मंजूरी दी। हेमंत सोरेन सरकार ने अपने राज्य में ओपीएस को लागू करने का चुनावी वादा किया था।
पंजाब : पंजाब के मुख्यमंत्री ने नवंबर 2022 में राज्य में पुरानी पेंशन योजना लागू की। पंजाब सरकार ने ओल्ड पेंशन स्कीम लाने के लिए सरकार की ओर से एक स्टडी टीम को तीन राज्यों (राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड) में भेजा था।
हिमालच प्रदेश : हिमाचल सरकार ने 5 मई को ओल्ड पेंशन लागू करने का नोटिफिकेशन जारी किया था। इसके लिए राज्य सरकार ने सेंट्रल सिविल सर्विस पेंशन रूल्स 1972 में संशोधन किया है।
ओपीएस लागू करने के बाद केंद्र के पास राज्यों का कितना पैसा अटका
देश के पांच राज्यों में एनपीएस की जगह ओपीएस को दोबारा लागू किया गया। इसके बाद केंद्र सरकार के पास इन राज्यों का पैसा फंसकर रह गया है। जिसे केंद्र ने वापस नहीं किया है। ऐसे में प्रदेश सरकारें ओपीएस को दोबारा लागू करने में हिचकिचा रही हैं। बता दें कि केंद्र के पास हिमाचल प्रदेश के 8200 करोड़, पंजाब के 18000 करोड़, राजस्थान के 28440 करोड़, छत्तीसगढ़ के 17240 करोड़ और झारखंड के 8107 करोड़ अटक कर रह गए हैं। केंद्र सरकार ने राज्यों सरकारों की इस रकम को नहीं लौटाया है, जिसकी वह काफी समय से मांग कर रहे हैं।