- उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा, “स्वास्थ्य कारणों” के पीछे छिपी संभावनाओं पर उठे सवाल।
- विपक्ष ने कहा, “यह सिर्फ़ उतना नहीं है जितना दिख रहा है” – अंदरूनी कारणों की अटकलें तेज़।
- न्यायपालिका और सरकार के बीच बढ़ते तनाव के बीच, धनखड़ की तीखी टिप्पणियाँ बनीं चर्चा का केंद्र।
देश के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को अचानक पद से इस्तीफा देकर पूरे राजनीतिक परिदृश्य में सनसनी फैला दी। उन्होंने राष्ट्रपति को लिखे अपने त्यागपत्र में “स्वास्थ्य कारणों” और इसे “ईश्वरीय कृपा के अधीन लिया गया निर्णय” बताया। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह कदम महज़ औपचारिक नहीं माना जा रहा — इसके पीछे छुपे संकेतों और संभावित अंदरूनी उथल-पुथल की चर्चा ज़ोर पकड़ रही है।
74 वर्षीय धनखड़ का कार्यकाल शुरू से ही मुखर, टकरावपूर्ण और असाधारण रहा है। एक ओर उन्होंने न्यायपालिका की ‘अति-सक्रियता’ और कॉलेजियम व्यवस्था पर बार-बार सवाल उठाए, वहीं दूसरी ओर संसद में विपक्षी दलों के साथ तीखे टकराव उनके कार्यकाल की पहचान बने रहे। इस पृष्ठभूमि में उनका अचानक इस्तीफा सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के रिश्तों को लेकर गहरे सवाल खड़े कर रहा है।
कांग्रेस ने जताई शंका, विपक्ष ने बताया “अंदरूनी दबाव का नतीजा”
धनखड़ के इस्तीफे के तुरंत बाद कांग्रेस ने एक तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह कदम जितना दिखता है, उससे कहीं अधिक गहरा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा:
“स्वास्थ्य सर्वोपरि है, पर यह इस्तीफा पूरी तरह अप्रत्याशित है। इसमें निश्चित ही कुछ ऐसा है जो आम जनता की नज़र से छुपा हुआ है।”
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि “दोपहर 1 बजे से शाम 4:30 बजे के बीच ऐसा क्या हुआ, जिसने उन्हें यह फैसला लेने पर मजबूर किया?”
इसी तरह कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने इसे “असामान्य और चौंकाने वाला” बताया और कहा कि उपराष्ट्रपति ने कभी इस ओर इशारा तक नहीं किया था। झारखंड मुक्ति मोर्चा की सांसद महुआ माजी ने भी संसद में उनकी नियमित उपस्थिति का हवाला देते हुए उनके इस्तीफे को “आश्चर्यजनक” बताया।
धनखड़ की मुखरता: क्या बनी असहजता की वजह?
धनखड़ ने उपराष्ट्रपति रहते हुए कई ऐसे बयान दिए जो संवैधानिक संस्थाओं के बीच खिंचाव की वजह बने। उन्होंने बार-बार यह कहा कि संसद सर्वोच्च है, और न्यायपालिका को मर्यादा में रहना चाहिए। उनका यह रवैया कई बार न्यायपालिका की आलोचना के रूप में देखा गया। उन्होंने कॉलेजियम व्यवस्था को “गैर-पारदर्शी” बताया और संविधान की पुनर्व्याख्या की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सत्तारूढ़ दल को उनकी यह मुखरता असहज करने लगी थी? क्या उन्हें हटाने के बजाय एक ‘सम्मानजनक विदाई’ दी गई?
राज्यसभा में लगातार टकराव और सत्ताधारी दल की असहजता
धनखड़ का संसद में आक्रामक संचालन शैली और विपक्ष पर कड़े रवैये ने उन्हें कई बार विवादों के केंद्र में ला खड़ा किया। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर विपक्ष के हंगामे के दौरान उनकी तीखी प्रतिक्रिया और फिर विपक्ष द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की कोशिश इस टकराव की चरम सीमा थी। हालांकि उस प्रस्ताव को उन्होंने “जंग लगे सब्ज़ी काटने वाले चाकू से बायपास सर्जरी” कहकर खारिज कर दिया था।
वहीं खबरें हैं कि भाजपा के भीतर भी कुछ वरिष्ठ नेता उनकी कार्यशैली से सहज नहीं थे, विशेषकर जब उनका बयान पार्टी की रणनीति से मेल नहीं खाता था।
क्या कोई नई भूमिका तय है? या पूरी तरह सन्यास?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धनखड़ को जल्द ही कोई नई भूमिका दी जा सकती है — मुमकिन है कि वे राष्ट्रपति पद के दावेदार बनाए जाएँ, या विदेश में कोई बड़ा राजनयिक दायित्व संभालें।
वहीं कुछ लोग इसे पार्टी द्वारा सार्वजनिक टकरावों से बचाने की रणनीति भी मानते हैं — क्योंकि हाल के दिनों में उन्होंने कुछ मुद्दों पर अप्रत्याशित रुख अपनाया, जिसने सत्ताधारी नेतृत्व को असहज कर दिया।
व्यक्तिगत पृष्ठभूमि: संघर्ष और सफलता की कहानी
धनखड़ का जीवन खुद में प्रेरणा है। राजस्थान के झुंझुनूं जिले के किठाना गाँव में एक किसान परिवार में जन्मे धनखड़ ने सैनिक स्कूल से शिक्षा ली, फिर राजस्थान विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री हासिल कर वकालत शुरू की। उन्होंने उच्च न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक अपनी वकालत का परचम लहराया।
राजनीति में उन्होंने कांग्रेस से शुरुआत की और चंद्रशेखर सरकार में मंत्री रहे। बाद में भाजपा से जुड़कर वे 2019 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बने, जहाँ उन्होंने ममता बनर्जी सरकार के साथ कई मुद्दों पर ज़ोरदार टकराव किया।
2022 में वे उपराष्ट्रपति बने और 74.37% मतों के साथ रिकॉर्ड जीत दर्ज की।
सरकार सवालों के घेरे में
धनखड़ का इस्तीफा ऐसे समय पर आया है जब संसद का मानसून सत्र चल रहा है, विपक्ष आक्रामक मुद्रा में है और देश 2026 के राष्ट्रपति चुनाव की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
इस निर्णय ने सत्ता के गलियारों में कई संभावनाओं के दरवाज़े खोले हैं — कौन होगा अगला उपराष्ट्रपति?
क्या धनखड़ की कोई नई भूमिका तय है?
या यह कोई गहरा संकेत है — किसी राजनीतिक संतुलन, न्यायपालिका-सत्ता संघर्ष या पार्टी के अंदरूनी समीकरणों का?

