सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना रेप या “अटेम्प्ट टु रेप” का मामला नहीं है। कोर्ट ने इसे असंवेदनशील और अमानवीय टिप्पणी मानते हुए इस पर रोक लगाई है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
जस्टिस बीआर गवई और एजी मसीह की बेंच ने बुधवार को मामले की सुनवाई की। बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह से असंवेदनशील हैं और यह निर्णय मानवाधिकारों के खिलाफ है। कोर्ट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है और इस मामले की गहन जांच करने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 मार्च को एक मामले में यह फैसला सुनाया था कि नाबालिग के निजी अंगों को पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना रेप की श्रेणी में नहीं आता। कोर्ट ने आरोपियों पर ‘अटेम्प्ट टु रेप’ की धाराएं हटाते हुए यौन उत्पीड़न की अन्य धाराओं में केस चलाने का आदेश दिया था।
केंद्र और राज्य सरकारों का रुख
केंद्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया और कहा कि यह रोक सही है क्योंकि इस तरह के फैसले पर तत्काल कदम उठाना आवश्यक था।
पुलिस कार्रवाई और FIR
मामला यूपी के कासगंज का है, जहां एक महिला ने अपनी 14 साल की बेटी के साथ अपहरण और यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप है कि 2021 में तीन आरोपियों ने नाबालिग लड़की के निजी अंगों को पकड़ने के बाद उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ने का प्रयास किया। इसके बाद आरोपी फरार हो गए, लेकिन पुलिस ने कोई उचित कार्रवाई नहीं की, जिससे महिला को अदालत का रुख करना पड़ा।
बॉम्बे हाईकोर्ट का समान फैसला पलट चुका है सुप्रीम कोर्ट
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले को पलटते हुए कहा था कि किसी बच्चे के यौन अंगों को छूना, या यौन इरादे से शारीरिक संपर्क से जुड़ा कोई भी कृत्य POCSO एक्ट के तहत अपराध माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामले में संवेदनशीलता की आवश्यकता है, और न्याय के लिए ऐसे कृत्यों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।





