➤ 22 सांसदों के नकली हस्ताक्षर कर भरा उपराष्ट्रपति चुनाव नामांकन
➤ जैकब जोसेफ का नामांकन रद्द, मामला राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुंचा
➤ केवल सीपी राधाकृष्णन और बी. सुदर्शन रेड्डी की उम्मीदवारी वैध
देश की संसदीय राजनीति में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। दिल्ली में आयोजित उपराष्ट्रपति चुनाव की नामांकन प्रक्रिया के दौरान जैकब जोसेफ नामक व्यक्ति ने 22 सांसदों के फर्जी हस्ताक्षर कर अपना नामांकन दाखिल कर दिया। नियमों के मुताबिक उपराष्ट्रपति पद का नामांकन केवल तभी वैध माना जाता है, जब उम्मीदवार को कम से कम 20 सांसदों का समर्थन और 20 सांसदों की स्वीकृति हासिल हो। इस बार की प्रक्रिया में जब जोसेफ द्वारा प्रस्तुत पत्रों की गहन जांच की गई, तो खुलासा हुआ कि सभी हस्ताक्षर फर्जी थे।
जैसे ही यह जानकारी सामने आई, रिटर्निंग ऑफिसर ने तुरंत नामांकन पत्र को अस्वीकार कर दिया और मामले की पूरी रिपोर्ट चुनाव आयोग व संसद सचिवालय को भेज दी। सांसदों के नामों का गलत इस्तेमाल कर नामांकन दाखिल करना न सिर्फ गंभीर अपराध है, बल्कि यह लोकतंत्र की जड़ों को हिलाने वाला कृत्य माना जा रहा है।
कौन है जैकब जोसेफ?
प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, जैकब जोसेफ कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं है। वह खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताता है और पहले भी कई बार चर्चित पदों के चुनाव में रुचि दिखा चुका है। हालांकि, इस बार उसने सीधे-सीधे फर्जीवाड़े का सहारा लिया। जानकारों का कहना है कि वह सुर्खियों में आने के लिए ऐसा कर रहा था।
जिन सांसदों के नाम इस फर्जी नामांकन में दर्ज किए गए थे, उन्होंने नाराजगी जाहिर की है। कई सांसदों ने कहा कि यह उनके नाम और पहचान का गलत इस्तेमाल है और संसद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला कदम है। कुछ सांसदों ने तो यह भी मांग की है कि आरोपी के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो ताकि भविष्य में कोई और ऐसा दुस्साहस न कर सके।
यह घटना संसद सचिवालय और नामांकन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जांच में इतनी गंभीर चूक हो सकती है तो भविष्य में और भी बड़े फर्जीवाड़े हो सकते हैं। कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि नामांकन के साथ-साथ सांसदों के समर्थन की डिजिटल वेरिफिकेशन भी होनी चाहिए, ताकि ऐसे मामले रोके जा सकें।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि संसद चुनाव प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा करना भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत गंभीर अपराध है। इसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और संवैधानिक प्रक्रिया में बाधा डालने जैसे धाराएं लागू हो सकती हैं। अगर दोष सिद्ध होता है, तो आरोपी को कई वर्षों की सजा भी हो सकती है।
यह खबर सामने आते ही सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा शुरू हो गई। कई लोगों ने इसे लोकतंत्र का मजाक बताया, वहीं कुछ ने तंज कसते हुए कहा कि “अब नामांकन भी जालसाजी से होगा तो असली लोकतंत्र कहां बचेगा?” जनता का मानना है कि अगर इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो यह गलत मिसाल बनेगी।

