Copy of खाटू श्याम धाम के लिए मुफ्त बस सेवा 29

सुप्रीम कोर्ट ने अशोका यूनिवर्सिटी प्रोफेसर अली खान को बड़ी राहत दी

हरियाणा की बड़ी खबर

सुप्रीम कोर्ट ने अशोका यूनिवर्सिटी प्रोफेसर को बड़ी राहत दी
एफआईआर पर रोक, क्लोज़र रिपोर्ट वाली शिकायत हुई निरस्त
अकादमिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर नई बहस छिड़ी


सुप्रीम कोर्ट ने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को बड़ी राहत दी है। यह मामला उनके एक सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा था, जिसे कथित तौर पर ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में आपत्तिजनक माना गया। इस पोस्ट को लेकर उनके खिलाफ दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं।

सुनवाई के दौरान हरियाणा पुलिस ने अदालत को बताया कि एक एफआईआर में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी है, जबकि दूसरी में चार्जशीट दायर की गई है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने क्लोज़र रिपोर्ट वाली एफआईआर को पूरी तरह निरस्त कर दिया और दूसरी एफआईआर पर जिला मजिस्ट्रेट को कार्रवाई करने से रोक दिया।

Whatsapp Channel Join

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रोफेसर की ओर से अदालत में दलील दी कि पुलिस ने महज एक टिप्पणी को आधार बनाकर भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 (राष्ट्र की संप्रभुता व अखंडता को नुकसान पहुँचाना) लगा दी, जबकि यह धारा केवल गंभीर मामलों—जैसे आतंकवाद, विदेशी शत्रु से सांठगांठ या हिंसक राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों—में लागू होती है। उनका कहना था कि इस तरह की धाराएँ लगाना पूरी तरह अनुचित और दुरुपयोग है।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा पुलिस की एसआईटी की जांच को लेकर सवाल उठाए थे। अदालत ने कहा था कि एसआईटी ने जांच का दायरा अनावश्यक रूप से बढ़ा लिया है और खुद भी गुमराह हो रही है। कोर्ट ने जुलाई की सुनवाई में चार हफ्तों में जांच पूरी करने का आदेश दिया था।

गौरतलब है कि 18 मई को प्रोफेसर अली खान को सोनीपत पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ शिकायतें महिला आयोग की चेयरपर्सन रेनू भाटिया और जठेड़ी गांव की सरपंच ने दर्ज करवाई थीं। आरोपों में बीएनएस धारा 152, धारा 353 (उत्तेजक बयान), धारा 79 (महिला की गरिमा को ठेस), धारा 196(1) (धार्मिक आधार पर दुश्मनी फैलाना) जैसी गंभीर धाराएँ लगाई गई थीं।

इस मामले ने देशभर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर बहस छेड़ दी। कई शिक्षाविदों और राजनीतिक दलों का कहना है कि यह कार्रवाई बौद्धिक विमर्श पर हमला है और यह विश्वविद्यालयों में विचारों की आज़ादी को खत्म करने की दिशा में खतरनाक संकेत है।

अब सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद प्रोफेसर को तत्काल राहत मिली है, लेकिन आगे की सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि दूसरी एफआईआर पर दर्ज चार्जशीट का औचित्य कितना ठोस है। यह मामला भविष्य में फ्री स्पीच और कानूनी दुरुपयोग पर एक मिसाल साबित हो सकता है।