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हुड्डा की छांव में कांग्रेस की नई चाल: नेता प्रतिपक्ष के लिए कादियान की ताजपोशी तय!

हरियाणा

● हरियाणा कांग्रेस में नेतृत्व संकट: हाईकमान ने हुड्डा को किनारे कर ‘संतुलन की राजनीति’ शुरू की
● नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में गैर-जाट बनाम जाट समीकरण, कादियान बन सकते हैं समाधान का चेहरा
● राज्यसभा चुनाव की रणनीति के लिए हुड्डा को साधना जरूरी, लेकिन चेहरा बदलने की तैयारी


Haryana LoP Politics: हरियाणा कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद छह महीने से लंबित नेता प्रतिपक्ष की घोषणा अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। मगर इस बार मामला सिर्फ पद की घोषणा भर का नहीं, बल्कि पूरे संगठनात्मक संतुलन और गुटीय राजनीति के भविष्य की दिशा तय करने का है।

कांग्रेस हाईकमान इस वक्त दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है—एक ओर उसे राज्यसभा चुनाव में हुड्डा का समर्थन चाहिए, दूसरी ओर वह यह भी जताना चाहता है कि हरियाणा कांग्रेस केवल भूपेंद्र हुड्डा तक सीमित नहीं है। ऐसे में नेता प्रतिपक्ष के लिए हुड्डा के करीबी, मगर राजनीतिक रूप से निष्प्रभ डॉ. रघुबीर कादियान को आगे लाया जा रहा है। यह एक ‘पावर-बैलेंसिंग मूव’ है, जिसमें नेतृत्व की कमान तो हुड्डा खेमे को दी जाएगी, लेकिन चेहरा बदला जाएगा।

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राजनीतिक रूप से यह तय माना जा रहा है कि हुड्डा को दोबारा नेता प्रतिपक्ष बनाना कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। पार्टी उनके नेतृत्व में तीन चुनाव हार चुकी है। इस परिप्रेक्ष्य में हाईकमान एक नया संदेश देना चाहता है कि पार्टी अब एक चेहरे के बजाय एक संस्था के रूप में कार्य करेगी।

गुटबाजी की बात करें तो अशोक अरोड़ा और चंद्रमोहन जैसे नाम ‘साइडलाइन’ इसलिए हो रहे हैं क्योंकि वे या तो किसी अन्य राजनीतिक धारा से जुड़ाव रखते रहे हैं या फिर किसी दूसरे गुट के प्रति निष्ठावान हैं। चंद्रमोहन की शैलजा से नजदीकी और अरोड़ा का इनेलो बैकग्राउंड, दोनों ही कांग्रेस के जातीय व सामाजिक समीकरणों में जोखिम पैदा कर सकते हैं।

अब जब राज्यसभा की दो सीटें 2026 में खाली होने जा रही हैं, कांग्रेस के पास एक सीट पाने का मौका है। इसके लिए उसे हुड्डा जैसे कद्दावर नेता की जरूरत पड़ेगी, जो विधायकों को संगठित रख सके। ऐसे में हुड्डा को नाराज़ भी नहीं करना और नेतृत्व में बदलाव का संदेश भी देना—इस ‘दोतरफा रणनीति’ का सबसे सुरक्षित रास्ता है रघुबीर कादियान को आगे बढ़ाना।

यह फैसला न सिर्फ कांग्रेस संगठन में संतुलन लाएगा, बल्कि आने वाले निकाय और लोकसभा चुनावों की रणनीति में भी स्पष्टता देगा। यह भी तय है कि अगर पार्टी अब भी ‘एक चेहरे’ पर ही निर्भर रही, तो आगामी चुनावों में उसे और नुकसान उठाना पड़ सकता है।