एक सामान्य नेता को क्या चाहिए, इतना ही कि वह मंत्री बन जाए। बच्चें उसकी राजनीतिक विरासत को संभाल लें। इस नजरिये से देखा जाए तो चौधरी बीरेंद्र सिंह कामयाब नेता है। क्योंकि वह स्वयं मंत्री रह चुके हैं। पत्नी विधायक और बेटा सांसद। लेकिन न तो चौधरी बीरेंद्र सिंह सामान्य नेता है, न ही उनकी महत्वाकाक्षा बस इतनी भर है। इसलिए वह बार-बार हरियाणा की राजनीति में मुख्यधारा में आने की जद्दोजहद में जुटे रहते हैं।
कांग्रेस में जब उनके सामने कड़ी चुनौती आई तो वह भाजपा में आ गए। अब यहां भी वह हाशिये की ओर जा रहे हैं, इसलिए बार-बार फिर से खुद को और अपने परिवार को राजनीति मजबूती देने के लिए मैदान में डट रहे हैं। यही वजह है कि बीरेंद्र सिंह ने राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा के बाद फिर से राजनीतिक तौर पर सक्रिय होने का ऐलान कर दिया है। उन्होंने जींद में 2 अक्तूबर को रैली का आयोजन किया है। इसके साथ ही यह ऐलान भी कर दिया कि 30 साथियों के नाम का ऐलान करेंगे, जो चुनाव लड़ेंगे। यह आजाद चुनाव लड़ेंगे या फिर पार्टी से, यह तय नहीं है।
सधी हुई सियासी चाल चल रहे हैं बीरेंद्र सिंह
30 साथियों के चुनाव लड़ने के नामों के ऐलान करने के पीछे बीरेंद्र चौधरी ने सधी हुई चाल चली है। इससे दो फायदे होंगे, पहला तो यह है कि चुनाव लड़ने वाला साथी रैली में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाएगा। क्योंकि उसे खुद को साबित जो करना है। दूसरा फायदा यह होगा कि वह भाजपा और दूसरी पार्टियों पर दबाव बनाने की स्थिति में खुद को खड़ा कर सकेंगे। चौधरी बीरेंद्र के नजदीक रहने वाले लोग उन पर यह आरोप भी लगाते हैं कि वह अपने बारे में ही सोचने वाले नेता हैं। इस तरह का आरोप लगाने वाले गलत भी नजर नहीं आते। क्योंकि भाजपा में आने के बाद भी बीरेंद्र सिंह ने अपने पूरे परिवार को तो राजनीति में स्थापित कर दिया, लेकिन अपने समर्थक व कार्यकर्ताओं को वह भाजपा में वह सम्मान दिलवाने में असफल रहे, जिसके वह हकदार थे। अब 30 नामों की घोषणा के पीछे वह अपने समर्थकों व साथियों को यह संदेश देना चाहते हैं कि उन्हें भी उनका वाजिब हक मिलेगा।
सबसे मुश्किल दौर से दो चार है बीरेंद्र सिंह
हरियाणा की राजनीति पर नजर रखने वाले दयाल सिंह कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. रामजी लाल कहते हैं कि इस वक्त बीरेंद्र चौधरी सबसे मुश्किल वक्त में हैं। उन्हें उचाना से कड़ी टक्कर मिल रही है, जजपा ने यहां अपनी जड़ मजबूत कर ली है। उनका बेटा जो कि हिसार से सांसद है, यहां भाजपा के पास कुलदीप बिश्नोई और दुष्यंत चौटाला दो बड़े नेता हैं। यदि जजपा के साथ गठबंधन होता है तो हिसार लोकसभा सीट जजपा को जा सकती है। इस तरह से चौधरी बीरेंद्र सिंह बिना लडे़ ही राजनीति की बड़ी लड़ाई हार सकते हैं। ऐसा होते हुए देखना नहीं चाहेंगे, इसलिए वह रैली कर खुद को चर्चाओं में लाना चाह रहे हैं। वह बीजेपी को किनारा कर सकते हैं। शर्त यह है कि उन्हें कोई बड़ा विकल्प मिलना चाहिए। इस विकल्प की तलाश में ही वह यह प्रस्तावित रैली करने जा रहे हैं।

बीरेंद्र सिंह इसलिए कहलाते हैं ट्रेजडी किंग
चौधरी बीरेंद्र सिंह का राजनीति में लंबा करियर रहा है। वह राज्यसभा में दो अगस्त 2016 को तीसरी बार चुने गए थे। साल 1977 में पहली दफे उचाना कलां विधानसभा सीट बनी थी तो बीरेंद्र सिंह यहां के पहले विधायक बने थे। एमरजेंसी के बाद कांग्रेस के खिलाफ लहर में जब कांग्रेस को मात्र पांच सीट मिली, तब भी बीरेंद्र सिंह ने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। उचाना कलां से 5 बार चुनाव जीत चुके हैं। सबसे ज्यादा इस सीट से 7 बार चुनाव भी बीरेंद्र सिंह ने लड़ा है। बीरेंद्र सिंह पांच बार 1977, 1982, 1994, 1996 और 2005 में उचाना से विधायक बन चुके हैं और तीन बार हरियाणा सरकार में मंत्री रह चुके हैं।
वर्ष 1984 में पूर्व सीएम चौटाला को भी मात दे चुके हैं बीरेंद्र
बीरेंद्र सिंह वर्ष 1984 में हिसार लोकसभा क्षेत्र से पहली दफे सांसद बने, तब उन्होंने इनेलो के ओमप्रकाश चौटाला को हराया था। वर्ष 2010 में कांग्रेस के टिकट से राज्यसभा सदस्य मनोनीत हुए, लेकिन कांग्रेस से 42 साल तक जुड़े रहने के बाद बीरेंद्र सिंह 16 अगस्त 2014 में जींद की एक रैली में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में शामिल हो गए। जून 2016 में भाजपा ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेज दिया। बीरेंद्र सिंह वर्ष 2022 तक राज्यसभा सदस्य रहे, लेकिन तमाम उपलब्धियों के बावजूद वह न तो सीएम बन पाए, न ही सत्ता के केंद्र बिंदू, इसका मलाल उन्हें अभी तक है।
पूर्व पीएम की हत्या न होती तो हरियाणा के होते सरदार
बीरेंद्र सिंह के नजदीक साथियों का कहना है कि यदि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या न होती तो बीरेंद्र सिंह हरियाणा के सीएम होते। लेकिन यह मौका उनके हाथ से छिन गया। इतना ही नहीं कांग्रेस के राज में उन्हें मंत्री बनाया जाना था, सारी तैयारी हो चुकी थी, लेकिन शपथ लेने से पहली रात को ही उनका नाम कट गया। इस मलाल में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। लेकिन भाजपा में भी अब वह हाशिये पर हैं। वह बार-बार जजपा से गठबंधन तोड़ने की बात करते हैं, लेकिन सुनवाई नहीं हो रही है।

