➤हरियाणा सरकार ने आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत 2,900 करोड़ रुपये भुगतान का दावा किया
➤प्रेस विज्ञप्ति में अवधि और पारदर्शिता को लेकर स्पष्टता नहीं
➤अस्पतालों को भुगतान में देरी, प्रक्रिया जटिल और अपारदर्शी बनी हुई
हरियाणा सरकार द्वारा 5 अगस्त को जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति में यह दावा किया गया कि राज्य के सूचीबद्ध अस्पतालों को अब तक आयुष्मान भारत योजना के तहत 2,900 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। लेकिन यह दावा खुद में अधूरा और भ्रम पैदा करने वाला प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें न तो स्पष्ट किया गया कि यह राशि कब से कब तक दी गई है, और न ही यह बताया गया कि यह रकम किस वित्तीय वर्ष से संबंधित है।
यदि यह आंकड़ा 2018 में योजना के आरंभ से अब तक की कुल राशि है, तो यह सालाना औसतन केवल 480-500 करोड़ रुपये बैठती है — जो हरियाणा जैसे बड़े और जनसंख्या वाले राज्य के लिए अत्यंत कम है। इससे स्पष्ट होता है कि यह दावा हाल ही में भारी-भरकम भुगतान का आभास देने का प्रयास भर है, जबकि जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है।

प्रधान, आईएमए, पानीपत।
स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत कई अस्पताल प्रबंधनों का कहना है कि उन्हें महीनों से कोई भुगतान नहीं मिला है। कई क्लेम लंबे समय से लंबित हैं और उनका निपटान नहीं किया गया है। सरकार द्वारा अपनाई गई “पहले आओ, पहले पाओ” (FIFO) नीति वास्तव में पारदर्शिता का मुखौटा बनकर रह गई है, जिसका प्रयोग भुगतान को टालने और चयनात्मक रूप से बांटने के लिए किया जा रहा है।
क्लेम रिजेक्शन की प्रक्रिया भी एक गंभीर समस्या है। मामूली तकनीकी त्रुटियों या अधूरे दस्तावेजों के नाम पर करोड़ों की दावेदारी रद्द कर दी जाती है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इन फैसलों में अक्सर मेडिकल एक्सपर्ट की भूमिका नहीं होती, बल्कि यह सॉफ्टवेयर या प्रशासनिक टीम के स्तर पर ही तय कर दिए जाते हैं।
अपील की प्रक्रिया इतनी जटिल और तकनीकी है कि छोटे और मझले अस्पताल उससे जूझ नहीं पाते, और अंततः अपने क्लेम को छोड़ देने पर मजबूर हो जाते हैं। इससे न केवल अस्पतालों का वित्तीय संकट बढ़ रहा है, बल्कि गरीब मरीजों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूती का दावा करने वाली सरकार को चाहिए कि वह पारदर्शी और त्वरित भुगतान प्रणाली सुनिश्चित करे, जिससे योजना का वास्तविक लाभ जमीनी स्तर तक पहुंचे।

