● सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को चेतावनी दी कि जांच में सहयोग न करने पर अवमानना कार्यवाही होगी
● हिसार के भाटिया गांव में दलितों के सामाजिक बहिष्कार की स्वतंत्र जांच के लिए दो पूर्व डीजीपी नियुक्त
● सरकार पर रसद सहायता न देने का आरोप, पुलिस ने सात में से छह आरोपियों को दी क्लीन चिट
Dalit Boycott Haryana: सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि हिसार के हांसी तहसील स्थित भाटिया गांव में दलितों के कथित सामाजिक बहिष्कार की जांच में राज्य सरकार सहयोग नहीं करती है, तो अदालत की अवमानना कार्यवाही शुरू की जाएगी। यह चेतावनी रिटायर्ड डीजीपी कामेंद्र प्रसाद के 31 जनवरी 2025 को लिखे पत्र के आधार पर दी गई है, जिसमें राज्य सरकार के असहयोग का जिक्र किया गया था।
न्यायमूर्ति एमएम सुंदरश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा कि बार-बार प्रयासों के बावजूद सरकार सहयोग देने को तैयार नहीं है, जो कि बेहद खेदजनक है। अदालत ने सरकार को स्पष्ट कर दिया कि किसी भी प्रकार की असहयोगिता अवमानना कार्यवाही को आमंत्रित कर सकती है। मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।
हरियाणा सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया कि अदालत द्वारा नियुक्त अधिकारियों की यात्रा और ठहरने की व्यवस्था सहित सभी आवश्यक सहयोग दिया जाएगा। हालांकि, याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील कोलिन गोंजाल्विस ने आरोप लगाया कि सरकार ने अब तक कोई रसद सहायता नहीं दी है। जबकि दो सदस्यीय जांच समिति ने तीन बार अपनी यात्रा की अनुमति मांगी थी, लेकिन हरियाणा सरकार ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
2017 से चल रहा है विवाद
इस मामले की जड़ें जून 2017 की एक घटना से जुड़ी हैं, जब हिसार के एक गांव में हैंडपंप के इस्तेमाल को लेकर दलित लड़कों पर ‘प्रमुख समुदाय’ के लोगों ने कथित रूप से हमला कर दिया था। इस हमले में छह लोग घायल हुए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2024 को इस मामले की स्वतंत्र जांच के लिए उत्तर प्रदेश के दो पूर्व डीजीपी—कामेंद्र प्रसाद और विक्रम चंद गोयल—को नियुक्त किया था। अदालत ने इन्हें तीन महीने के भीतर अपनी स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था।
हरियाणा पुलिस ने दी थी क्लीन चिट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया गया कि 2017 के बाद से कोई बड़ी अप्रिय घटना सामने नहीं आई है और “सामान्य स्थिति” बनी हुई है। इसके अलावा, 20 अगस्त 2017 को इस मामले में आरोप पत्र दायर किया गया था, लेकिन किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई। हरियाणा पुलिस ने सात आरोपियों में से छह को क्लीन चिट दे दी थी और उनका नाम चार्जशीट में शामिल नहीं किया गया था।
अब सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद यह देखना अहम होगा कि हरियाणा सरकार जांच प्रक्रिया में कितनी गंभीरता दिखाती है।

