- जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ली, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद की शपथ दिलाई।
- जस्टिस गवई भारत के पहले बौद्ध और दूसरे दलित चीफ जस्टिस बने, उनका कार्यकाल नवंबर 2025 तक रहेगा।
- शपथ समारोह में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति समेत कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे, CJI की मां ने इसे “मेहनत और सेवा का फल” बताया।
Justice Gavai new Chief Justice: भारत के न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है, जब जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने मंगलवार को भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में शपथ दिलाई। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, गृहमंत्री अमित शाह, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और कई वरिष्ठ न्यायमूर्तियों व केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी रही।
जस्टिस गवई का कार्यकाल छह महीने का होगा, जो 23 नवंबर 2025 को उनके सेवानिवृत्त होने के साथ समाप्त होगा। उन्हें यह पद उनके पूर्ववर्ती जस्टिस संजीव खन्ना की सेवानिवृत्ति के बाद मिला, जिन्होंने वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस गवई के नाम की सिफारिश की थी।
जस्टिस गवई देश के पहले बौद्ध और दूसरे दलित चीफ जस्टिस हैं। इससे पहले जस्टिस केजी बालाकृष्णन 2007 में भारत के पहले दलित चीफ जस्टिस बने थे। सुप्रीम कोर्ट में अपनी नियुक्ति के बाद जस्टिस गवई कई ऐतिहासिक निर्णयों का हिस्सा रहे, जिनमें 2016 के नोटबंदी के फैसले को सही ठहराना और चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करना शामिल हैं।
उनकी मां कमलताई गवई ने इस उपलब्धि को ‘मेहनत और सेवा का फल’ बताया। उन्होंने कहा कि भूषण गवई ने बेहद साधारण पृष्ठभूमि से शुरुआत की और अपने पिता की राह पर चलते हुए समाज की सेवा की भावना को हमेशा जीवित रखा।
जस्टिस गवई का जन्म 24 नवंबर 1960 को महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ था। उन्होंने 1985 में अपने कानूनी करियर की शुरुआत की थी और 1987 में बॉम्बे हाईकोर्ट में स्वतंत्र वकालत शुरू की। वर्ष 2003 में वे बॉम्बे हाईकोर्ट के एडिशनल जज बने और 2005 में स्थायी जज के रूप में नियुक्त हुए। 2019 में वे सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त हुए।
सामाजिक न्याय और संविधानिक मूल्यों पर उनके विचार भी स्पष्ट रहे हैं। 2024 में एक सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि न्यायपालिका की निष्पक्षता और ईमानदारी समाज के भरोसे की नींव है, और अगर यह भरोसा डगमगाया तो लोग ‘भीड़ का न्याय’ जैसे गलत रास्ते अपना सकते हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रिटायरमेंट के बाद वे किसी राजनीतिक या संवैधानिक पद को नहीं स्वीकारेंगे, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी को सर्वोपरि मानते हैं।

