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Manmohan singh: 33 साल राज्यसभा सांसद, 2 बार PM, जब चुनाव लड़े तो हार गए

देश दिल्ली हरियाणा

Delhi भारत के सबसे सादगीपूर्ण और ईमानदार राजनेताओं में गिने जाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने पूरे राजनीतिक करियर में सिर्फ एक बार लोकसभा चुनाव लड़ा—और उसमें हार गए। 1999 के दक्षिणी दिल्ली लोकसभा चुनाव में उनका मुकाबला बीजेपी के विजय कुमार मल्होत्रा से था। ये चुनाव उनके लिए न केवल चुनौतीपूर्ण साबित हुआ बल्कि उन्हें चुनावी राजनीति से दूर रहने की सीख भी दे गया।

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सोनिया गांधी के कहने पर लिया फैसला

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नरसिम्हा राव सरकार में वित्त मंत्री के रूप में अपनी शानदार परफॉर्मेंस के बाद मनमोहन सिंह ने 1999 में लोकसभा चुनाव लड़ने का मन बनाया। सोनिया गांधी के विशेष आग्रह पर उन्होंने दक्षिणी दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरने का फैसला किया। मनमोहन सिंह ने सोचा कि दक्षिणी दिल्ली में मुस्लिम और सिख आबादी करीब 50% है, जो कांग्रेस और उनके पक्ष में वोट करेगी। लेकिन हकीकत में यह योजना सफल नहीं हो सकी। पार्टी के अंदर उन्हें बाहरी उम्मीदवार माना गया और स्थानीय कार्यकर्ताओं का समर्थन नहीं मिला।

चुनाव प्रचार में आई मुश्किलें

कहा जाता है कि पार्टी ने मनमोहन को चुनाव के लिए 20 लाख रुपये दिए थे, लेकिन यह राशि काफी कम थी। वे चंदा लेने से बचते रहे, जबकि उनके विरोधी विजय कुमार मल्होत्रा ने मजबूत जमीनी नेटवर्क के जरिए बढ़त बनाई। पैसे की कमी और कार्यकर्ताओं की उदासीनता के चलते उनका प्रचार कमजोर रहा।

चुनावी दांव-पेच से रहे दूर

मनमोहन सिंह को लगा कि पार्टी के नेता और कार्यकर्ता स्वाभाविक रूप से उनके पक्ष में काम करेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब पैसों की जरूरत पड़ी, तो उन्होंने अनिच्छा से चंदा लिया, परंतु चुनाव तक उनकी स्थिति मजबूत नहीं हो सकी।

हार के बाद भी मिसाल बने

कहा जाता है कि चुनाव के बाद मनमोहन सिंह ने बचे हुए 7 लाख रुपये कांग्रेस पार्टी को लौटा दिए, जो उनकी ईमानदारी का प्रमाण है। इस हार ने उन्हें चुनावी राजनीति से दूर कर दिया, लेकिन इसके बाद वे अपने सिद्धांतों और सादगी के लिए देशभर में मशहूर हुए।

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