Chhath Puja 2023 : देशभर में आज सूर्य उपासना के लिए माना जाने वाले महापर्व छठ हर्षोल्लास से मनाया जा रहा है। छठ पूजा के तीसरे दिन भगवान सूर्यदेव और उनकी बहन छठ माता की विशेष पूजा का प्रावधान है। सूर्य को ग्रंथों में प्रत्यक्ष भगवान माना है, जिसे हम देख सकते हैं। ज्योतिष के नजरिए से सूर्य पंचदेवों में से एक हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शिव, मां दुर्गा और भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार हर वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ महापर्व मनाया जाता है। जिसकी शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है। षष्ठी तिथि को छठ पर्व संध्या के दौरान भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
बताया जाता है कि चार दिनों तक चलने वाले छठ पूजा पर्व में भगवान सूर्यदेव की पूजा के साथ छठी मैय्या की पूजा की जाती है। इस दिन महिलाएं व्रत रखकर अपनी संतान की लंबी आयु और घर में सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। छठ पर्व के तीसरे दिन व्रत रखने वाली महिलाएं शाम के समय ढलते सूर्य को नदी या तालाब के पानी में खड़ी होकर अर्घ्य देती हैं। रविवार के दिन संध्या के समय ढलते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दौरान पूरे परिवार के साथ श्रद्धा से की गई पूजा-अर्चना का फल ज्यादा मिलता है। मान्यता है कि ऐसा करने से छठ माता और सूर्य देव सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। जानिए छठ पूजा के तीसरे दिन शुभ मुहूर्त और पूजा की विधि।

छठ पूजा में सूर्यदेव की पूजा और उन्हें अर्घ्य देने का विशेष महत्व होता है। छठ महापर्व पर पूजा के दिन दिन व्रत रखने वाली महिलाएं संध्या के दौरान ढलते सूर्य को अर्घ्य देंगी। ज्योतिष के अनुसार रविवार 19 नवंबर को सूर्यास्त के दौरान शाम 5:26 बजे लोग सूर्य को अर्घ्य देंगे। पूजा अर्चना से पहले श्रद्धालु सभी पूजन सामग्री को बांस की टोकरी में रखकर घाट पर पहुंचते हैं। नदी या तालाब के जल में खड़े होकर मन ही मन भगवान सूर्य देव और छठ मैया की आराधना की जाती है। इसके बाद भगवान सूर्य देव को अर्घ्य दिया जाता है।

जानिए भगवान सूर्यदेव को अर्घ्य देने का महत्व
छठ पूजा के तीसरे दिन पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले छठ महापर्व के तीसरे दिन पूजा का विशेष दिन होता है। प्रथम दिन नहाय-खाय, द्वितीय दिन खरना, तृतीय दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य और चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत की विधि को पूरा किया जाता है। छठ पर्व का तृतीय दिन विशेष माना जाता है।

मान्यता है कि इस दिन श्रद्धालु नए पकड़े पहनकर परिवार के साथ नदी या तालाब के घाट पर पहुंचते हैं। यहां सभी महिलाएं परिवार के साथ एकत्रित होकर भगवान सूर्य देव की पूजा-अर्चना कर अर्घ्य देती है। तत्पश्चात संतान की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए कामना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह स्नान, पूजा और दान करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने से सूर्यदेव और जल में भगवान विष्णु की अप्रत्यक्ष रूप से एक साथ पूजा मानी जाती है।

बता दें कि भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एक लोटे में जल लेकर उसमें थोड़ा कच्चा दूध मिला लें। इसी लोटे में लाल चंदन, चावल, लाल फूल और कुश डालकर प्रसन्न मन से सूर्य की ओर मुंह करके सूर्य मंत्र का जप करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर पुष्पांजलि अर्पित करें। मान्यता है कि पूजा-अर्चना से छठ माता सभी के परिवार और संतान को लंबी आयु और सुख समृद्धि का वरदान देती हैं।

बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में हर्षोल्लास से मनाया जाता है छठ महापर्व
छठ महापर्व की बात करें तो वर्तमान में देश के कोने-कोने में यह पर्व मनाया जाने लगा है, लेकिन देश के चार महानगरों सहित बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में इस महापर्व की अलग ही खास बात है। छठ महापर्व मुख्य रूप से बिहार और यूपी के पूर्वांचल में दीपावली की तरह मनाया जाने वाला त्योहार है। वहीं अब दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई सहित विभिन्न राज्यों में रहने वाले उत्तर भारत समाज के लोग इस महापर्व को धूमधाम से मनाते हैं।

सोमवार को पूरा होगा 36 घंटे का निर्जला व्रत
मान्यता है कि छठ महापर्व के द्वितीय दिन खरना के दौरान महिलाएं शाम को खरना का प्रसाद ग्रहण कर अगले 36 घंटे के लिए निर्जला व्रत को प्रारंभ करती हैं। फिर तीसरे दिन शाम के समय ढलते सूर्य को अर्घ्य देंगी। फिर अगले दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण पूरा करती है। इस बार 19 नवंबर रविवार शाम के समय ढलते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद 20 नवंबर सोमवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर 36 घंटे के निर्जला व्रत का पारण पूरा किया जाएगा।

जानिए भगवान सूर्यदेव की आराधना से जुड़ी विशेष बातें
मान्यता है कि भगवान सूर्यदेव मात्र एक ऐसे प्रत्यक्ष देवता है, जिन्हें हम देख सकते हैं। सूर्यदेव को पंचदेवों में से एक माना गया है, इसलिए शुभ कार्यों में भगवान गणेश की तरह सूर्यदेव की पूजा-अर्चना का भी प्रावधान है। सूर्यदेव 9 ग्रहों के राजात हैं। भगवान श्रीकृष्ण भी सूर्यदेव की पूजा-अर्चना करते हैं।

इतना ही नहीं, भगवान सूर्यदेव रामदूत बजरंग बली हनुमान के गुरु माने जाते हैं। शनिदेव, यमराज और यमुना सूर्यदेव की संताने हैं। सूर्यदेव की उपासना से मनुष्य में आत्मविश्वास की वृद्धि होती है। माना गया है कि तांबे के लौटे से भगवान सूर्यदेव को जल अर्पित करना शुभ रहता है।

जानिए छठ महापर्व पर पूजा का इतिहास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब पांडव सारा राजपाठ जुए में हार गए, तब द्रौपदी और पांडवों ने छठ व्रत रखकर पूजा-अर्चना की थी। छठ महापर्व पूजा-अर्चना की शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है। दौपदी और पांडवों ने मिलकर व्रत रखकर छठ पूजा की थी। यह व्रत और पूजा पांडवों ने अपने राज्य को वापस पाने के लिए रखा था।

इस व्रत के बाद पांडवों की मनोकामना पूर्ण हुई थी और उन्हें अपना खोया हुए प्रदेश वापस मिल गए। इसलिए छठ के मौके पर भगवान सूर्यदेव की पूजा-अर्चना फलदायी मानी जाती है। माना जाता है कि अगर नि:संतान महिलाएं इस पूजा-अर्चना करती हैं तो उन्हें संतान की प्राप्ति होती है। घर और परिवार में हमेशा खुशहाली और सुख-समृद्धि का वास रहता है।

