Navratri Special : नवरात्र का आज पहला दिन है और इस दिन घटस्थापन के बाद मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री(Maa Shailputri) का पूजन, अर्चन और स्तवन किया जाता है। शैल का अर्थ है हिमालय और पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री(Maa Shailputri) कहा जाता है।
बता दें कि देश के सभी शहरों में नवरात्र में मां दुर्गा के धरती पर आगमन का विशेष महत्व होता है। इस साल चैत्र नवरात्र पर 30 साल के बाद सर्वार्थअमृत सिद्धि(Sarvartha Amrit Siddhi) योग बनने जा रहा है, जो अत्यंत शुभकारी है। इस दौरान मां दुर्गा की आराधना करने से सभी कष्ट और दुखों से मुक्ति मिलती हैं। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 8 अप्रैल को देर रात 11 बजकर 55 मिनट पर शुरू हो चुकी हैं। जो कि 9 अप्रैल यानि आज रात्रि 9 बजकर 44 मिनट पर समाप्त होगी, इसलिए 9 अप्रैल को घटस्थापना हैं।

नवरात्र के पहले दिन घटस्थापन के बाद मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का पूजन, अर्चन और स्तवन किया जाता है। शैल का अर्थ है हिमालय और पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। पार्वती के रूप में इन्हें भगवान शंकर की पत्नी के रूप में भी जाना जाता है। वृषभ (बैल) इनका वाहन होने के कारण इन्हें वृषभारूढा के नाम से भी जाना जाता है। इनके दाएं हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में इन्होंने कमल धारण किया हुआ है।

मां शैलपुत्री का स्वरूप
माता आदि शक्ति ने अपने इस रूप में शैल हिमालय के घर जन्म लिया था, इसी कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। शैलपुत्री नंदी नाम के वृषभ पर सवार होती हैं और इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प होता है। मां शैलपुत्री के चरणों में गौघृत अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य और दीर्घ आयुका आशीर्वाद मिलता है और उनका मन एवं शरीर दोनों ही निरोगी रहता है। इसके साथ ही गौघृत का अखंड दीपक भी जलाते हैं।

शैलपुत्री समस्त वन्य जीव जंतुओं की रक्षक
माता शैल पुत्रीके आशीवार्द से विचारो में गम्भीरता आती है और हर तरह की बीमारी दूर होती है, दीर्घ आयुकाआशीर्वाद मिलता है। साधक आत्मविश्वास की जाग्रति भी होती है। यह नंदी नामक बैल पर सवार संपूर्ण हिमालय पर विराजमान हैं। यह वृषभ वाहन शिवा का ही स्वरूप है। घोर तपस्चर्या करने वाली शैलपुत्री समस्त वन्य जीव जंतुओं की रक्षक भी हैं। शैलपुत्री के अधीन वे समस्त भक्तजन आते है जो योग साधना तप और अनुष्ठान के लिए पर्वतराज हिमालय की शरण लेते हैं।

मां शैलपुत्री पूजा विधि
– सबसे पहले पूजा और घटस्थापना करें।
– इसके बाद मां शैलपुत्री की पूजा करें।
– देवी मां को अक्षत, सफेद फूल, धूप, दीप, फल और मिठाई अर्पित करें।
– पूजा के दौरान मंत्रों का उच्चारण करें और फिर माता शैलपुत्री की पूजा करें।
– पूजा के बाद पूरी श्रद्धा के साथ घी के दीपक से मां शैलपुत्री की आरती करें।
– पूजा समाप्त होने के बाद मां शैलपुत्री से प्रार्थना करें।
– देवी मां को दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।





