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“मृत्यु के मार्ग पर मनुष्य अकेला ही चलता है”: पंडित रतन शास्त्री उपेंद्र मुनि

हरियाणा

समालखा में चातुर्मास प्रवचन, सांसारिक मोहमाया त्याग दान-पुण्य पर जोर

पत्नी, मां, परिजन भी श्मशान तक साथ, जीवन सादगी से जीने का संदेश


समालखा, अशोक शर्मा

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शहर की नई जैन स्थानक में चल रहे चातुर्मास के दौरान, पंडित रतन शास्त्री उपेंद्र मुनि ने अपने प्रवचनों में मनुष्य को जीवन की क्षणिकता और सांसारिक मोहमाया से मुक्ति का संदेश दिया। शुक्रवार को दिए गए अपने व्याख्यान में मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य हर वस्तु को ‘मेरी-मेरी’ कहता है, परंतु यह नहीं सोचता कि मृत्यु के महामार्ग पर उसे अकेला ही चलना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस संसार में कोई भी वस्तु या संबंध स्थाई नहीं है, और न ही कोई चीज मनुष्य की सम्पत्ति है।

मुनि श्री ने अपने प्रवचन में समझाया कि जब संसार से विदाई का वक्त आता है, तो मनुष्य की जुबान पर यह गीत होता है, ‘अकेला आए अकेला जाए’। फिर भी इंसान ‘मेरा-मेरी’ करता रहता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जब तुम्हारे जाने की बारी आएगी, तब जिस प्राण प्यारी पत्नी पर तुम गर्व करते हो, वह भी मृत्यु के समय विलाप करती हुई एक कोने में बैठी रहेगी। अत्यंत स्नेह रखने वाली मां भी तुम्हें दरवाजे तक छोड़ने आएगी, और स्वजन, परिजन तथा मित्रगण केवल श्मशान तक ही साथ जाएंगे। अगला और अंतिम सफर मनुष्य को अकेले ही तय करना है।

पंडित रतन शास्त्री उपेंद्र मुनि ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि इंसान को ‘मेरा-मेरी’ का भाव त्यागते हुए दान-पुण्य और धार्मिक कर्म करते रहना चाहिए। उन्होंने सादगी में अपना जीवन यापन करने की प्रेरणा दी, ताकि मनुष्य मोहमाया के बंधनों से मुक्त होकर आध्यात्मिक उन्नति कर सके।

आज के इन प्रेरक प्रवचनों में एसएस जैन सभा के प्रधान वीर प्रकाश जैन, अश्विनी जैन, पवन जैन, संजय जैन, प्रमोद जैन, धर्मपाल, शिवकुमार, अशोक, वकील जैन, त्रिलोक जैन, मुनीराम जैन, जितेंद्र जैन सहित सैकड़ों महिलाएं मुख्य रूप से उपस्थित रहीं। प्रवचनों का समापन एक अटूट भंडारे के साथ हुआ, जिसमें सभी श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।