रमजान या Ramadan इस्लामी Panchang का नौवां महीना है। मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानता हैं। इसलिए इस माह को नेकियों और इबादतों का महीना यानी पुण्य और उपासना का माह माना जाता हैं। Ramadan माह के अन्त और शव्वाल माह के पहले दिन मनाई जाती हैं।
Ramadan के आखरी दिन चांद देखकर अगले दिन ईद घोषित किया जाता है। यानी नया चांद देखकर किया जाता है। अगर चन्द्रमा का दर्शन नहीं हो पाया तो उपवास के तीस दिनों के पूरा होने के बाद घोषित किया जाता है। बता दें कि रमजान का महीना कभी उन्नतीस दिन का तो कभी तीस दिन का होता है। इस महीने में मुस्लिम समुदाय के लोग उपवास रखते हैं। उपवास को अरबी में सौम कहा जाता है, इसलिए इस मास को अरबी में माह-ए-सियाम भी कहते हैं। फ़ारसी में उपवास को रोज़ा कहते हैं। भारत के मुसलिम समुदाय पर फ़ारसी प्रभाव ज़्यादा होने के कारण उपवास को फ़ारसी शब्द ही उपयोग किया जाता है।

हालांकि किसी भी पवित्र धर्मग्रंथ में उपवास का कोई प्रमाण नहीं है तथा अल्लाह कबीर वह सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं, जो पैगंबर मुहम्मद को मिले और उन्हें जन्नत दिखाई। उपवास के दिन सूर्योदय से पहले कुछ खालेते हैं, जिसे सहरी कहते हैं। दिनभर न कुछ खाते हैं, न पीते हैं। शाम को सूर्यास्तमय के बाद रोजा खोलकर खाते हैं, जिसे इफ़्तारी कहते हैं।

अल्लाह की होती है अधिक इबादत
रमज़ान को नेकियों या पुन्यकार्यों का मौसम-ए-बहार (बसंत) कहा गया है। रमजान को नेकियों का मौसम भी कहा जाता है। इस महीने में मुस्लमान अल्लाह की इबादत (उपासना) ज्यादा करता है। अपने परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उपासना के साथ, कुरआन परायण, दान धर्म करता है। यह महीना समाज के गरीब और जरूरतमंद बंदों के साथ हमदर्दी का है। इस महीने में रोजादार को इफ्तार कराने वाले के गुनाह माफ हो जाते हैं। पैगम्बर मोहम्मद सल्ल से आपके किसीसहाबी (साथी) ने पूछा अगर हममें से किसी के पास इतनी गुंजाइश न हो क्या करें। तो हजरत मुहम्मद ने जवाब दिया कि एक खजूर या पानी से ही इफ्तार करा दिया जाए।

अल्लाह की राह में खर्च करना अफजल
यह महीना मुस्तहिक लोगों की मदद करने का महीना है। रमजान के तअल्लुक से हमें बेशुमार हदीसें मिलती हैं और हम पढ़ते और सुनते रहते हैं, लेकिन क्या हम इस पर अमल भी करते हैं। ईमानदारी के साथ हम अपना जायजा लें कि क्या वाकई हम लोग मोहताजों और नादार लोगों की वैसी ही मदद करते हैं जैसी करनी चाहिए? सिर्फ सदकए फित्र देकर हम यह समझते हैं कि हमने अपना हक अदा कर दिया है। जब अल्लाह की राह में देने की बात आती है, तो हमें कंजूसी नहीं करना चाहिए। अल्लाह की राह में खर्च करना अफज़ल है। ग़रीब चाहे वह अन्य धर्म के क्यों न हो, उनकी मदद करने की शिक्षा दी गई है, दूसरों के काम आना भी एक इबादत समझी जाती है।

रोजा रखने से पिछले गुनाह माफ
जकात, सदका, फित्रा, खैर ख़ैरात, ग़रीबों की मदद, दोस्त अहबाब में जो ज़रुरतमंद हैं, उनकी मदद करना ज़रूरी समझा और माना जाता है। अपनी ज़रूरीयात को कम करना और दूसरों की ज़रूरीयात को पूरा करना अपने गुनाहों को कम और नेकियों को ज़्यादा करदेता है। मुहम्मद (सल्ल) ने फरमाया है, जो शख्स नमाज के रोजे ईमान और एहतेसाब (अपने जायजे के साथ) रखे उसके सब पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएंगे। रोजा हमें जब्ते नफ्स (खुद पर काबू रखने) की तरबियत देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है, लेकिन अब जैसे ही माहे रमजान आने वाला होता है, लोगों के जहन में तरह-तरह के चटपटे और मजेदार खाने का तसव्वुर आ जाता है।



