हरियाणा में अगले साल 2024 में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी का गैर जाट वोट बैंक फार्मूले पर ही फोकस नजर आ रहा है। संगठन में बदलाव कर पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने यह संदेश दे दिया है।
बता दें कि हरियाणा में 22.2 प्रतिशत जाट वोट बैंक के बावजूद भी पार्टी ने नंबर 2 पर 21 प्रतिशत वोट बैंक वाली पिछड़ी जाति के वोट बैंक पर फोकस किया है। इसकी वजह जाट वोट बैंक का कई पार्टियों में बंटा होना है। यही कारण है कि पार्टी ने बीसी समाज के बड़े चेहरे और कुरूक्षेत्र से सांसद नायब सैनी को संगठन की कमान देते हुए प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।
2019 में भी पार्टी नेतृत्व ने यह फॉर्मूला कायम रखा
हरियाणा में जाट बैंक के दबदबे के बाद भी पार्टी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद गैर जाट चेहरा मनोहर लाल खट्टर पर दांव खेला था। पांच साल पूर्ण बहुमत से जीत के बाद 2019 में भी पार्टी नेतृत्व ने यह फॉर्मूला कायम रखा और फिर सत्ता में वापसी की। जिसके बाद दोबारा गैर जाट चेहरे मनोहर लाल को ही मुख्यमंत्री बनाया। अब एक बार फिर से पार्टी गैर जाट फार्मूले को लेकर 2024 में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।
भाजपा का ऐसा वोट, हर चुनाव में पार्टी को मिलता है
हरियाणा में चाहे कोई भी पार्टी हो, उसका फोकस जाट वोटों पर ही रहता है। खासकर कांग्रेस इस वोट बैंक को अभी तक अपना मानती है। इसकी वजह यह भी है कि कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा जाट नेताओं का बड़ा चेहरा है। हालांकि भाजपा भी जाट समाज के कुल 28 प्रतिशत वोट बैंक में से 18 से 20 प्रतिशत जाट वोट हर चुनाव में लेकर जाती है। यह भाजपा का ऐसा वोट है जो हर चुनाव में पार्टी को मिलता है।
सीटों पर जाटों का महत्वपूर्ण प्रभाव
हरियाणा में राज्य की 90 विधानसभा सीटों में से कम से कम 40 या इससे अधिक सीटों पर जाटों का महत्वपूर्ण प्रभाव है। 2014 के विधानसभा चुनाव में, उन्होंने अन्य समुदायों की तरह बड़ी संख्या में भाजपा को वोट दिया, लेकिन 2019 में, वे बड़े पैमाने पर सत्ता में बैठी भाजपा के खिलाफ हो गए और कांग्रेस, जेजेपी और आईएनएलडी में बंट गए, जिन्होंने क्रमश 30, 10 और एक सीट जीती।
वोटों के स्विंग कारण जाट दिग्गजों की हुई हार
2019 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ जाट वोटों के स्विंग के कारण ही पार्टी के जाट दिग्गजों की हार हुई, जिनमें कैबिनेट मंत्री कैप्टन अभिमन्यु और ओम प्रकाश धनखड़, पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेम लता और तत्कालीन राज्य भाजपा अध्यक्ष सुभाष बराला के नाम शामिल हैं। हालांकि, हरियाणा के सियासी जानकारों का कहना है कि भाजपा का जाटों से दूरी बनाना अच्छा फैसला नहीं है।