हरियाणा में इस बार के नगर निकाय चुनावों में वोटिंग EVM मशीनों से होगी, लेकिन VVPAT (वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रायल) मशीनें नहीं लगाई जाएंगी। यानी, मतदाता यह नहीं देख पाएंगे कि उनका वोट सही उम्मीदवार को गया या नहीं, क्योंकि उन्हें 7 सेकंड तक दिखने वाली पर्ची नहीं मिलेगी।
हरियाणा निर्वाचन आयोग ने 2020 में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) से M3 मॉडल की 45,000 EVM (जो VVPAT के साथ आती हैं) मांगी थी, लेकिन ECI ने मना कर दिया। आयोग ने स्पष्ट किया कि उनकी नीति के अनुसार, राज्य निर्वाचन आयोगों को M3 मॉडल नहीं दिया जाता। इसलिए, हरियाणा में पुराने M2 मॉडल की EVM भेजी गईं, जिनमें VVPAT लगाने की तकनीकी सुविधा ही नहीं है।
क्या कहता है कानून?
- 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी बनाम ECI केस में फैसला दिया था कि EVM के साथ VVPAT अनिवार्य रूप से लगाई जाए।
- लोकसभा और विधानसभा चुनावों में यह नियम लागू भी हो चुका है, लेकिन निकाय और पंचायत चुनावों में इसे राज्य आयोगों की मर्जी पर छोड़ दिया गया।
- पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार के मुताबिक, हरियाणा राज्य निर्वाचन आयोग अपने स्तर पर भी VVPAT वाली EVM खरीद सकता है, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
VVPAT क्यों जरूरी है?
जब मतदाता EVM में वोट डालता है, तो VVPAT मशीन उस उम्मीदवार के नाम और चुनाव चिह्न की पर्ची प्रिंट करती है, जो 7 सेकंड तक कांच की विंडो में दिखती है, फिर यह स्लिप मशीन के कंपार्टमेंट में गिर जाती है। यह मतदाता को यह भरोसा दिलाने के लिए होती है कि उनका वोट सही जगह गया है।
राजनीतिक दलों की क्या राय?
EVM की विश्वसनीयता को लेकर पहले भी विवाद हो चुके हैं। VVPAT मशीन लाकर पारदर्शिता बढ़ाने की बात कही गई थी, लेकिन हरियाणा निकाय चुनावों में इसकी गैर-मौजूदगी फिर से सवाल खड़े कर रही है। राजनीतिक दलों को इस फैसले की जानकारी दे दी गई है, लेकिन मतदाता असमंजस में हैं कि बिना VVPAT के चुनाव कितना पारदर्शी रहेगा?