श्रावण मास शुरू हो चुका है। यह महीना शिवभक्तों के लिए विशेष होता है। वैसे तो भगवान शिव की महिमा अपरंपार है लेकिन, शिव के मंदिरों का अपना ही महत्व है।
भगवान शिव का ऐसा ही एक मंदिर पानीपत में स्थित है। इस मंदिर को प्रगटेश्वर महादेव धाम शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का इतिहास काफी रोचक होने के साथ-साथ बहुत ही दिलचस्प भी है।
पानीपत की तिसरी लड़ाई से इस शिव लिंग का है गहरा संबंध
मान्यताए है कि प्रगटेश्वर महादेव धाम पर सावन के महीने में कांवड़ चढ़ाने से सभी मनोकमानाएं पूर्ण होती हैं। यहां पर साल में दो बार लगने वाले मेले में दूर-दराज के क्षेत्र से शिवभक्त आकर भंडारा लगाते हैं तथा मन्नते मांगते हैं। प्रगटेश्वर महादेव धाम शिव मन्दिर सात एकड़ भूमि में फैला हुआ है। गांव के बुजुर्गों को भी नहीं पता कि यह मन्दिर कब बना।
इस मन्दिर का पानीपत की तीसरी लड़ाई से भी गहरा संबंध है। कहा जाता है कि 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई के दौरान मराठा सेना के सरदार सदाशिव राव भाऊ की सेना ने इसी गांव में पड़ाव डाला था। भाऊ ने इस शिव मंदिर का जीर्णोंद्वार भी करवाया था।
गांव के प्रत्येक घर से एक व्यक्ति को हुई थी जेल
दिलचस्प बात यह है कि यह मंदिर जिस गांव में स्थित है वह 1944 तक मुस्लिम बाहुल्य गांव था। ग्रामीणों का कहना है कि एक बार कुछ असामाजिक तत्वों ने मंदिर में कोई आपतिजनक चीज टांग दी जिससे गांव में सांप्रदायिक दंगे हो गए।
गांव वालों का कहना है कि तत्कालीन सरकार ने गांव के लगभग सभी हिंदू परिवारों से एक सदस्य को छह माह की सजा सुनाई और उन्हें लाहौर जेल भेज दिया गया। विभाजन के बाद जींद रियासत के गांव हाडवा से रोढ़ जाति के लोग यहां आकर बस गए और यह गांव हिंदू बाहुल्य हो गया।
मंदिर का घंटा चोरी करने वाले हो गए थे अंधे
ग्रामीणों का कहना है कि एक बार मंदिर में लगा विशाल घंटा चोरों ने उतार लिया तो चोर जैसे ही मन्दिर से बाहर निकले वे अंधे हो गए। चोर जैसे ही मंदिर में वापस आए उन्हें फिर से सबकुछ दिखने लगा। यह सिलसिला पूरी रात जारी रहा। सुबह होते ही ग्रामीणों ने उन्हें पकड़ लिया और घंटा वापस मंदिर में टांग दिया गया।
यहां कैसे प्रकट हुआ शिवलिंग
भादड़ गांव के लोगों का कहना है कि उनके बड़े बुजुर्ग बताते थे कि फिलहाल जिस जगह पर यह मंदिर स्थित है इसके पीछे कुम्हार बर्तन के लिए मिट्टी खोद रहे थे। उस दौरान कुम्हार की खुरपी किसी मज़बूत चीज से टकराई तो उस जगह से दूध की धारा फुट पड़ी।
तब कुम्हार ने इसे दैवीय शक्ति मानते हुए भगवान को याद किया। कहते हैं इसी घटना के बाद इस जगह पर शिवलिंग अपने आप ही ऊपर आ गया। उस कुम्हार ने शिवलिंग की आराधना कर इस स्थान पर शिव मन्दिर बनवाया। समय-समय पर इस मन्दिर का जीर्णोद्वार होता रहा है।

