पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में 1987 में न्यायिक सेवा में भर्ती हुए जिला न्यायाधीश वेद पाल गुप्ता को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के अपने आदेश को बरकरार रखा। उन पर भ्रष्ट तरीकों से कई संपत्तियां हासिल करने का आरोप था, जिसमें गुड़गांव, फरीदाबाद और पंचकुला जैसी जगहों पर संपत्तियों की कथित खरीदारी शामिल थी।
2020 में उच्च न्यायालय की पूर्ण अदालत ने वेद पाल गुप्ता के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी, जिसके बाद उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी। गुप्ता ने 2021 में इस फैसले को चुनौती दी थी। अदालत ने अपनी जांच में पाया कि गुप्ता ने अपने रिश्तेदारों के नाम पर कई संपत्तियां खरीदी थीं, और उनका यह कदम भ्रष्ट तरीके से संपत्ति अर्जित करने के रूप में देखा गया।
अदालत ने यह भी पाया कि गुप्ता की सास ने 1998 में एक संपत्ति खरीदी थी, जिसे छह महीने के भीतर गुप्ता की पत्नी के नाम वसीयत कर दिया गया। इसके अलावा, अन्य संपत्तियों के बारे में भी अदालत ने गुप्ता और उनके परिवार के खिलाफ कई विसंगतियां उजागर कीं, जैसे आयकर रिकॉर्ड में अनियमितताएं और संपत्तियों के मूल्य पर सवाल उठाए गए।
अंत में, अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि गुप्ता ने अपने रिश्तेदारों के नाम पर संपत्तियां खरीदकर और भ्रष्ट तरीकों से संपत्ति अर्जित की, जिससे उनकी सिफारिश की गई अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश सही था।







